प्रजापति दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान के बाद माता सती द्वारा देह त्याग करने की पौराणिक कथा हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है।

नई दिल्ली/अमर भारती। हिंदू धर्म के पुराणों में माता सती और भगवान शिव की कथा को प्रेम, समर्पण, सम्मान और त्याग का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। माता सती द्वारा यज्ञ अग्नि में आत्मदाह करने की घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं थी, बल्कि यह अहंकार और भक्ति के बीच हुए संघर्ष का भी प्रतीक मानी जाती है। यह कथा मुख्य रूप से शिव पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण और स्कंद पुराण में वर्णित मिलती है। इस घटना के बाद ही शक्तिपीठों की स्थापना और माता सती के पुनर्जन्म के रूप में माता पार्वती के अवतार की भूमिका तैयार होती है।
कौन थे प्रजापति दक्ष?
प्रजापति दक्ष को ब्रह्माजी का मानस पुत्र माना जाता है। वे अत्यंत तेजस्वी, विद्वान और प्रभावशाली शासक थे। हालांकि उनके व्यक्तित्व में अहंकार भी प्रबल था। दक्ष की अनेक पुत्रियों में से एक थीं माता सती। सती बचपन से ही भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं। कठोर तपस्या के बाद उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। लेकिन दक्ष भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे। उन्हें शिव का साधु स्वरूप, भस्म धारण करना, श्मशान में निवास करना और सांसारिक वैभव से दूर रहना स्वीकार नहीं था।
दक्ष और भगवान शिव के बीच विवाद की शुरुआत
शिव पुराण के अनुसार एक बार देवताओं की सभा में प्रजापति दक्ष पहुंचे। सभा में उपस्थित सभी देवता उनके सम्मान में खड़े हो गए, लेकिन भगवान शिव अपने स्थान पर ही बैठे रहे। दक्ष ने इसे अपना अपमान समझ लिया। यहीं से उनके मन में भगवान शिव के प्रति वैर और अधिक बढ़ गया। उन्होंने मन ही मन शिव का अपमान करने का संकल्प ले लिया।
दक्ष यज्ञ का आयोजन
कुछ समय बाद प्रजापति दक्ष ने कनखल (वर्तमान हरिद्वार के निकट) में एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में देवताओं, ऋषियों, मुनियों, गंधर्वों और राजाओं को आमंत्रित किया गया। लेकिन जानबूझकर भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा गया। दक्ष का उद्देश्य स्पष्ट था। वह भगवान शिव को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना चाहते थे।
माता सती ने क्यों जाने का निर्णय लिया?
जब माता सती ने देखा कि सभी देवता और ऋषि यज्ञ में जा रहे हैं, तो उनके मन में भी अपने पिता के घर जाने की इच्छा जागी। उन्होंने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि जहां सम्मान न हो, वहां जाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि बिना निमंत्रण के किसी समारोह में जाना अपमान का कारण बन सकता है। लेकिन माता सती ने उत्तर दिया कि पुत्री को अपने पिता के घर जाने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। अंततः भगवान शिव ने उन्हें नंदी और अपने गणों के साथ यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।
यज्ञ में माता सती के साथ क्या हुआ?
जब माता सती यज्ञ स्थल पर पहुंचीं तो उन्हें देखकर अधिकांश लोग असहज हो गए। कथा के अनुसार उनकी माता प्रसूति ने उनका स्वागत किया, लेकिन प्रजापति दक्ष ने उनसे सम्मानपूर्वक व्यवहार नहीं किया। सबसे दुखद बात यह थी कि यज्ञ में भगवान शिव के लिए न तो कोई आसन रखा गया था और न ही यज्ञ का भाग निर्धारित किया गया था। जब माता सती ने इसका कारण पूछा, तब दक्ष ने भगवान शिव के बारे में अपमानजनक शब्द कहे। उन्होंने शिव के स्वरूप, जीवनशैली और व्यक्तित्व का उपहास किया।
भगवान शिव का अपमान सहन नहीं कर सकीं माता सती माता सती अपने पति और आराध्य भगवान शिव के प्रति पूर्ण समर्पित थीं। अपने सामने भगवान शिव का अपमान होते देख उन्हें गहरा आघात पहुंचा। उन्हें यह भी महसूस हुआ कि भगवान शिव ने उन्हें पहले ही सावधान किया था, लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी। क्रोध, पीड़ा और आत्मग्लानि से व्याकुल होकर माता सती ने सभा में उपस्थित सभी लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जिस शरीर को उन्होंने दक्ष के घर में जन्म लेकर प्राप्त किया है, अब वह शरीर उनके लिए बोझ बन चुका है।
माता सती ने कैसे किया आत्मदाह?
शिव पुराण और भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि माता सती ने योगाग्नि के माध्यम से अपने प्राण त्याग दिए। कई लोककथाओं और लोकप्रिय कथाओं में इसे यज्ञ कुंड में कूदकर आत्मदाह करने के रूप में बताया जाता है। हालांकि कुछ पुराणों के अनुसार उन्होंने अपनी योग शक्ति से शरीर का त्याग किया था। उनके देह त्याग करते ही यज्ञ स्थल पर हाहाकार मच गया।
भगवान शिव का रौद्र रूप
जब भगवान शिव को माता सती के देह त्याग का समाचार मिला तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र और भद्रकाली को उत्पन्न किया। वीरभद्र ने दक्ष यज्ञ को नष्ट कर दिया और प्रजापति दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित कर दिया।
शक्तिपीठों की स्थापना कैसे हुई?
माता सती के निधन से दुखी भगवान शिव उनका शरीर लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। उनके शोक और तांडव से सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अनेक टुकड़े किए। जहां-जहां उनके अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका सहित विभिन्न स्थानों पर कुल 51 या 52 प्रमुख शक्तिपीठ स्थापित हुए।
माता सती का पुनर्जन्म
माता सती ने अगले जन्म में हिमालयराज हिमवान और माता मेना के घर जन्म लिया। इस जन्म में वे माता पार्वती कहलायीं। कठोर तपस्या के बाद उन्होंने पुनः भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। इस प्रकार शिव और शक्ति का पुनर्मिलन हुआ।
कथा से मिलने वाली सीख
माता सती की कथा केवल धार्मिक प्रसंग नहीं है बल्कि कई महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। अहंकार विनाश का कारण बनता है। अपने प्रियजनों और गुरुओं की उचित सलाह को अनदेखा नहीं करना चाहिए। सम्मान और आत्मसम्मान जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भक्ति और समर्पण की शक्ति सबसे बड़ी होती है। शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। माता सती के आत्मदाह की कथा हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक मानी जाती है। यह घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं थी, बल्कि धर्म, सम्मान, अहंकार और भक्ति के बीच संघर्ष का प्रतीक थी। प्रजापति दक्ष के अहंकार, भगवान शिव के अपमान और माता सती के त्याग ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को गहराई से प्रभावित किया। यही घटना आगे चलकर शक्तिपीठों की स्थापना और माता पार्वती के अवतार का आधार बनी।
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