रील्स, AI और डोपामिन का जाल: स्क्रीन की कैद में सिमटती युवाओं की जिंदगी


बाराबंकी। डिजिटल दौर में स्मार्टफोन सुविधा का सबसे बड़ा साधन बन चुका है, लेकिन यही सुविधा अब युवाओं के लिए गंभीर मानसिक और शारीरिक खतरे का कारण भी बन रही है। लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया की लत और बीमारी के इलाज के लिए इंटरनेट व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बढ़ती निर्भरता नई चुनौतियां पैदा कर रही है। हालिया विश्लेषण के अनुसार 15 से 40 वर्ष के युवाओं में मोबाइल स्क्रीन एडिक्शन के मामलों में करीब 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
जिला अस्पताल बाराबंकी के मनोकक्ष की मनोचिकित्सक डॉ. आरती यादव के अनुसार, मोबाइल स्क्रीन पर लगातार रील्स और वीडियो देखने की आदत दिमाग में डोपामिन का स्तर बढ़ाती है। हर नया वीडियो कुछ पल की खुशी देता है, जिससे व्यक्ति बार-बार स्क्रीन स्क्रॉल करता रहता है। इस आदत को ‘डूम स्क्रोलिंग’ कहा जाता है। कई लोग केवल कुछ मिनट मोबाइल देखने के इरादे से शुरुआत करते हैं, लेकिन घंटों तक स्क्रीन से अलग नहीं हो पाते।
डॉ. आरती बताती हैं कि यदि कोई व्यक्ति रात में सोने से पहले लगातार रील्स देखता है, नींद खुलने पर सबसे पहले मोबाइल चेक करता है या पर्याप्त नींद के बावजूद थकान महसूस करता है, तो यह स्क्रीन एडिक्शन का संकेत हो सकता है। लंबे समय तक ऐसा रहने पर डिप्रेशन, एंग्जायटी, भावनात्मक तनाव और नींद संबंधी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। जो लोग मोबाइल को सिरहाने रखकर सोते हैं, उनमें डरावने सपने और बार-बार नींद टूटने जैसी शिकायतें भी अधिक देखी जाती हैं।
उन्होंने बताया कि एक और चिंताजनक प्रवृत्ति इंटरनेट और एआई के आधार पर स्वयं इलाज करने की है। कई लोग डॉक्टर से परामर्श लेने के बजाय ऑनलाइन जानकारी या एआई चैटबॉट की सलाह पर दवा लेना शुरू कर देते हैं। जबकि एआई कभी-कभी ‘एआई हेलुसिनेशन’ के कारण तथ्यात्मक रूप से गलत लेकिन भरोसेमंद दिखने वाली जानकारी भी प्रस्तुत कर सकता है। ऐसी स्थिति में मरीज गलत इलाज अपनाकर अपनी सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सलाह के अनुसार दो वर्ष तक के बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। दो से पांच वर्ष तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम अधिकतम एक घंटा प्रतिदिन होना चाहिए, जबकि पांच वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों को केवल आवश्यकता के अनुसार ही मोबाइल का उपयोग करने देना चाहिए। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए और मोबाइल को बिस्तर से दूर रखना चाहिए।
डॉ. आरती यादव का कहना है कि यदि मोबाइल की लत व्यक्ति के व्यवहार, पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों या मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने लगे तो इसे सामान्य आदत समझकर नजरअंदाज न करें। समय रहते मनोचिकित्सक से परामर्श लेना ही सबसे सुरक्षित उपाय है।