पत्थरों में बोलती है सदियों पुरानी कहानी, कोणार्क के रहस्यों से रूबरू हुए प्रतिभागी

पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम में कोणार्क की मूर्तिकला और स्थापत्य पर डॉ. राजीव द्विवेदी ने दिया शोधपरक व्याख्यान


लखनऊ, 2 सितंबर 2026। पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां सिर्फ कला नहीं, बल्कि सदियों पुराने समाज, संस्कृति, आस्था और जीवनशैली की जीवंत कहानी भी कहती हैं। कोणार्क का सूर्य मंदिर इसका एक अनूठा उदाहरण है। इसी विरासत को पुरातात्विक और वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का अवसर बुधवार को लखनऊ में आयोजित पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों को मिला।
प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह की पहल पर आयोजित पाठ्यक्रम के 11वें दिन वृंदावन शोध संस्थान, मथुरा के निदेशक डॉ. राजीव द्विवेदी ने ‘कोणार्क की मूर्तिकला’ और ‘कोणार्क एक अधूरा स्थापत्य’ विषय पर दो ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिए। उन्होंने कोणार्क की मूर्तियों से लेकर मंदिर की स्थापत्य संरचना, निर्माण तकनीक और संरक्षण इतिहास तक कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल तरीके से समझाया।
जब मंदिर को समझाया गया मानव शरीर के रूप में
डॉ. द्विवेदी ने ओडिशा की कलिंग स्थापत्य परंपरा की पृष्ठभूमि से अपनी बात शुरू की। उन्होंने बताया कि ओडिशा की मूर्तिकला भारतीय कला परंपरा में विशिष्ट स्थान रखती है। मंदिर की संरचना को मानव शरीर के रूपक के रूप में समझाते हुए उन्होंने बाड़ा, गंडी और मस्तक जैसे स्थापत्य अंगों की विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि कोणार्क केवल धार्मिक स्थापत्य का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह तत्कालीन समाज और संस्कृति का भी दस्तावेज है।
देवी-देवताओं से लेकर शिकार और संगीत तक
कोणार्क की मूर्तिकला को डॉ. द्विवेदी ने पांच प्रमुख वर्गों में बांटकर समझाया। इनमें देवी-देवता, आकाशीय मंडल एवं खगोलीय विषय, पशु-पक्षी एवं जलीय जीव, पौराणिक विषय और धर्मनिरपेक्ष एवं लौकिक जीवन से जुड़ी मूर्तियां शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों में केवल धार्मिक आस्था ही दिखाई नहीं देती, बल्कि तत्कालीन समाज की रोजमर्रा की जिंदगी भी नजर आती है। नृत्य-संगीत, उत्सव, शिकार और दैनिक गतिविधियों के दृश्य उस दौर के सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं।
पत्थरों ने भी बताई निर्माण तकनीक की कहानी
कोणार्क के स्थापत्य की चर्चा करते हुए डॉ. द्विवेदी ने विमान/देउल, जगमोहन, नटमंदिर और भोगमंडप की संरचना पर प्रकाश डाला। उन्होंने रथाकार मंदिर की विशेषताओं को भी विस्तार से समझाया।
उन्होंने बताया कि मंदिर निर्माण में क्लोराइट, लेटराइट और खोंडालाइट जैसे पत्थरों का इस्तेमाल हुआ। खास बात यह है कि इनमें से कई पत्थर कोणार्क के आसपास उपलब्ध नहीं थे। निर्माण सामग्री को चन्द्रभागा नदी के जलमार्ग से लाए जाने की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह उस समय की निर्माण तकनीक और परिवहन क्षमता को समझने का महत्वपूर्ण संकेत है।
खंडहरों में छिपा है कोणार्क का इतिहास
व्याख्यान के दौरान कोणार्क के संरक्षण इतिहास पर भी चर्चा हुई। डॉ. द्विवेदी ने राजेंद्र नाथ मित्र के अध्ययन का उल्लेख करते हुए बताया कि 19वीं शताब्दी में मुख्य मंदिर काफी हद तक ध्वस्त हो चुका था, जबकि जगमोहन प्रमुख रूप से विद्यमान संरचना के रूप में बचा था।
उन्होंने कहा कि कोणार्क के वर्तमान खंडित स्वरूप को समझने के लिए केवल उसकी मूर्तियों को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्थापत्य, मूर्तिकला और पुरातात्विक साक्ष्यों का समग्र अध्ययन जरूरी है।
विशेषज्ञ के व्याख्यान ने बढ़ाई विरासत को समझने की दृष्टि
पुरातत्व विभाग की निदेशक रेनू द्विवेदी ने डॉ. राजीव द्विवेदी का पौधा एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर स्वागत किया। उन्होंने उनके विद्वत्तापूर्ण और सरल प्रस्तुतीकरण की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे विशेषज्ञ व्याख्यान प्रतिभागियों में भारतीय कला, स्थापत्य और पुरातात्विक विरासत को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने की क्षमता विकसित करने में उपयोगी हैं।
ऑनलाइन और ऑफलाइन जुड़े 150 प्रतिभागी
कार्यक्रम का ऑनलाइन एवं ऑफलाइन संचालन बलिहारी सेठ ने किया। इसमें 100 प्रतिभागियों ने ऑफलाइन और 50 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन सहभागिता की। कुल 150 प्रतिभागियों ने कोणार्क की कला और स्थापत्य से जुड़े इस विशेष व्याख्यान का लाभ उठाया।
डॉ. राजीव द्विवेदी के व्याख्यान ने प्रतिभागियों को कोणार्क की मूर्तिकला, स्थापत्य संरचना, निर्माण तकनीक और संरक्षण इतिहास को एक व्यापक पुरातात्विक नजरिए से समझने का अवसर दिया। कोणार्क की पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियों के माध्यम से सदियों पुराने भारतीय ज्ञान, कला और सामाजिक जीवन को देखने की यह कोशिश पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रही।