Nepal Glacier Collapse: क्या टाली जा सकती थी इतनी बड़ी तबाही? ग्लेशियर टूटने से पहले मिले थे खतरे के संकेत

Nepal Glacier Collapse: तबाही से पहले दिखे थे संकेत

नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद आई बाढ़ और भूस्खलन
नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन।

नई दिल्ली/अमर भारती। नेपाल-चीन सीमा के पास ग्लेशियर टूटने (Nepal Glacier Collapse) के बाद आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक इस आपदा में 1,100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 4,000 लोग अब भी लापता हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 मौतें दर्ज की गई हैं। अब एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट ने इस आपदा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है-क्या तबाही से पहले खतरे के संकेत दिखाई दे रहे थे?

ग्लेशियर टूटने से पहले क्या दिखा?

HiRISK वैज्ञानिकों के रैपिड हेजार्ड असेसमेंट के मुताबिक सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण में घटना से पहले कुछ “pre-event indications” दिखाई दिए थे। इनमें ग्लेशियर (Nepal Glacier Collapse)की सतह में बदलाव, पिघले पानी का असामान्य रूप से भूरा होना और आसपास की चट्टानी ढलान में फैलती दरार शामिल थी। विशेषज्ञों ने पाया कि 24 अगस्त की सैटेलाइट तस्वीरों में पिघले पानी का रंग स्पष्ट रूप से भूरा दिखाई दे रहा था। साथ ही आसपास की चट्टानी ढलान में दरार भी बढ़ रही थी।

Early Warning System की कमी पर सवाल

HiRISK रिपोर्ट के मुताबिक जिस प्रभावित क्षेत्र में ग्लेशियर (Nepal Glacier Collapse) से जुड़ी यह घटना हुई, वहां ग्लेशियर संबंधी खतरों के लिए प्रभावी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम मौजूद नहीं था। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी व्यवस्था होती तो कम से कम नदी के बहाव की दिशा में आगे के इलाकों में लोगों को समय रहते चेतावनी दी जा सकती थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि सीमा चौकी के पास शुरुआती आपदा इतनी तेजी से आगे बढ़ी कि वहां पारंपरिक चेतावनी प्रणाली भी शायद पर्याप्त समय नहीं दे पाती। लेकिन नीचे की ओर 10 मिनट या उससे अधिक की चेतावनी मिलने पर व्यापक और सक्षम सिस्टम काफी लोगों की जान बचाने में मदद कर सकते थे।

नेपाल-चीन सहयोग पर भी सवाल

इस घटना ने नेपाल और चीन के बीच सीमा-पार आपदा (Nepal Glacier Collapse)निगरानी और सूचना साझा करने की जरूरत को भी फिर सामने ला दिया है। मई में दोनों देशों के अधिकारियों ने प्राकृतिक खतरों की निगरानी और प्रतिक्रिया को लेकर बैठक की थी। इसमें ग्लेशियल झीलों की निगरानी और खतरे वाले क्षेत्रों की मैपिंग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अचानक बाढ़ जैसे खतरे सीमा नहीं देखते। ऐसे में दोनों देशों के बीच रियल-टाइम डेटा और चेतावनी साझा करना बेहद महत्वपूर्ण है।

वैज्ञानिकों की चेतावनी क्या है?

HiRISK और अन्य विशेषज्ञों की रिपोर्टों का मुख्य संदेश है कि भविष्य में सिर्फ ग्लेशियल झीलों (Nepal Glacier Collapse) की निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। अस्थिर ग्लेशियरों, चट्टानी ढलानों और पूरे नदी-मार्ग पर नजर रखने वाले मल्टी-हैजर्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम की जरूरत है। साथ ही चेतावनी सिर्फ वैज्ञानिकों या प्रशासन तक नहीं, बल्कि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों और संवेदनशील परियोजनाओं में काम कर रहे कर्मचारियों तक तुरंत पहुंचनी चाहिए।

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