बगावत के बाद बदला सियासी नक्शा: कांग्रेस से शिवसेना तक कौन बना और कौन मिट गया? पढ़िए स्पेशल रिपोर्ट

TMC और शिवसेना में बढ़ते अंदरूनी विवाद के बीच भारत में राजनीतिक दलों के टूटने का लंबा इतिहास एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है।

भारत में राजनीतिक दलों के टूटने का इतिहास, कांग्रेस से लेकर शिवसेना तक पार्टी विभाजन का प्रतीकात्मक चित्र
कांग्रेस से लेकर शिवसेना तक भारतीय राजनीति में हुए बड़े पार्टी विभाजन और सियासी बदलावों का प्रतीकात्मक दृश्य

नई दिल्ली/अमर भारती। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान और महाराष्ट्र में शिवसेना के उद्धव गुट को मिल रही चुनौतियों ने देश की राजनीति में एक बार फिर पार्टी विभाजन के इतिहास को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। दोनों राज्यों की मौजूदा राजनीतिक स्थिति यह संकेत दे रही है कि सत्ता संघर्ष, नेतृत्व विवाद और गुटबाजी भारतीय राजनीति में अब भी बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं।

TMC और शिवसेना में बढ़ता सियासी तनाव

पश्चिम बंगाल में TMC के भीतर कथित अंदरूनी कलह ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। पार्टी नेताओं के बीच मतभेद और बयानबाजी ने विपक्ष को हमले का मौका दिया है। वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के सामने राजनीतिक चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं, जिससे राज्य की सियासत में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। इन घटनाओं ने राजनीतिक हलकों में यह बहस तेज कर दी है कि क्या ये दल भी उसी राह पर बढ़ रहे हैं, जहां आंतरिक बगावत के कारण बड़ी पार्टियां दो हिस्सों में बंट चुकी हैं।

भारत में पार्टी टूटने का ऐतिहासिक सिलसिला

भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का विभाजन कोई नई बात नहीं है। पिछले पांच दशकों में कई ऐसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं जिन्होंने देश की राजनीति की दिशा बदल दी।

1969: कांग्रेस का ऐतिहासिक विभाजन

सबसे बड़ा और ऐतिहासिक विभाजन 1969 में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस के पुराने नेताओं के बीच मतभेद गहरा गए। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हुए विवाद के बाद कांग्रेस दो हिस्सों—कांग्रेस (O) और कांग्रेस (R)—में बंट गई। आगे चलकर इंदिरा गांधी का गुट ही मुख्य कांग्रेस बना।

1977: जनता पार्टी और उसका टूटना

आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी वैचारिक मतभेद और नेतृत्व संघर्ष के कारण ज्यादा समय तक एकजुट नहीं रह सकी। 1979 तक यह कई गुटों में बंट गई और इसी टूटन से 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का उदय हुआ।

1990 का दशक: क्षेत्रीय दलों का उदय

इस दौर में जनता दल के कई टुकड़े हुए, जिनसे राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जनता दल यूनाइटेड (JDU), बीजू जनता दल (BJD) और अन्य क्षेत्रीय दलों का गठन हुआ। इसी समय समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल मजबूत हुए।

1999: NCP का गठन

कांग्रेस से अलग होकर शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई। यह विभाजन नेतृत्व और वैचारिक मतभेद का परिणाम था।

AIADMK और सत्ता संघर्ष

तमिलनाडु में जे. जयललिता के निधन के बाद AIADMK में नेतृत्व संकट पैदा हुआ, जिससे पार्टी कई गुटों में बंट गई और चुनाव आयोग तक मामला पहुंचा।

2017: समाजवादी पार्टी का पारिवारिक विवाद

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के भीतर अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच सत्ता संघर्ष हुआ, जिसके बाद चुनाव आयोग ने अखिलेश गुट को असली पार्टी माना।

2021: LJP में बगावत

रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी में चाचा-भतीजे के बीच विवाद हुआ, जिससे पार्टी दो हिस्सों में बंट गई।

2022–2024: शिवसेना और NCP का विभाजन

महाराष्ट्र की राजनीति में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का बड़ा विभाजन हुआ, वहीं बाद में अजीत पवार के नेतृत्व में NCP भी दो हिस्सों में बंट गई।

राजनीतिक दल क्यों टूटते हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पार्टी टूटने के मुख्य कारण हैं- नेतृत्व संघर्ष, वैचारिक मतभेद, क्षेत्रीय आकांक्षाएं, सत्ता की होड़, और संगठनात्मक असंतोष।

TMC के सामने चुनौती

वर्तमान परिस्थितियों में TMC के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक एकता बनाए रखने की है। यदि पार्टी में मतभेद और बढ़ते हैं, तो यह मामला चुनाव आयोग तक भी पहुंच सकता है। इतिहास बताता है कि भारत में कई बड़े राजनीतिक विभाजन अंततः चुनाव आयोग के फैसलों पर निर्भर रहे हैं। भारत की राजनीति हमेशा परिवर्तनशील रही है। TMC और शिवसेना जैसे दलों में चल रही हलचल इस बात की याद दिलाती है कि सत्ता, नेतृत्व और संगठनात्मक संतुलन ही किसी भी राजनीतिक पार्टी की स्थिरता की असली कुंजी है।

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