अयोध्या राम मंदिर में दान राशि और जेवरातों में कथित हेरफेर की जांच तेज। एफआईआर दर्ज न होने पर सवाल, एसआईटी ने ट्रस्ट पदाधिकारियों समेत 18 लोगों से पूछताछ की।

नई दिल्ली/अमर भारती। राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दान की गई नकदी और कीमती जेवरातों में कथित हेरफेर के मामले में हर दिन नए सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दान की राशि चोरी होने की बात सामने आ चुकी है और संदिग्धों से रकम भी बरामद हुई है, तो अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं कराई गई? मामले में गठित एसआईटी (विशेष जांच दल) लगातार जांच कर रही है, लेकिन जांच शुरू होने से पहले ट्रस्ट की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि ट्रस्ट के पदाधिकारी पिछले करीब दो सप्ताह तक संदिग्धों को अपने स्तर पर बैठाकर पूछताछ करते रहे और उनकी निशानदेही पर रकम भी बरामद की गई। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या एसआईटी जांच शुरू होने से पहले महत्वपूर्ण सबूतों से छेड़छाड़ की गई?
छह जून को सामने आया था मामला
सूत्रों के अनुसार दान राशि में कथित गड़बड़ी का मामला 6 जून को सामने आया था। आरोप है कि शुरुआत में ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारी मामले को दबाने की कोशिश करते रहे। गोपनीय तरीके से कुछ लोगों को संदिग्ध मानकर उनसे पूछताछ शुरू की गई। बाद में उनकी निशानदेही पर रकम की बरामदगी भी हुई। इसके बावजूद पुलिस में तत्काल मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया। कई पूर्व पुलिस अधिकारियों और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि चोरी और बरामदगी जैसे तथ्यों के सामने आने के बाद भी एफआईआर न होना असामान्य स्थिति है।
संदिग्धों को दिनों तक बैठाकर पूछताछ पर सवाल
मामले में जिन लोगों से पूछताछ की गई, उनमें लवकुश नामक युवक भी शामिल है। उसके परिवार का दावा है कि चोरी का मामला सामने आने के बाद ट्रस्ट के लोग उसे अपने साथ ले गए थे और तब से परिवार का उससे संपर्क नहीं हो पाया। इसी तरह अन्य संदिग्धों के परिवार भी खुलकर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि बिना किसी औपचारिक मुकदमे के संदिग्धों को इतने दिनों तक रोककर पूछताछ किस अधिकार के तहत की गई।
एफआईआर में देरी से बढ़ी सबूत मिटाने की आशंका
कानूनी जानकारों का कहना है कि जब चोरी की पुष्टि हो चुकी है और रकम की बरामदगी भी हुई है, तब एफआईआर दर्ज न होना कई आशंकाओं को जन्म देता है। आलोचकों का सवाल है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मामले से जुड़े बड़े जिम्मेदार लोगों को बचाने या साक्ष्यों को प्रभावित करने के लिए मुकदमा दर्ज करने में देरी की गई। हालांकि सूत्रों का दावा है कि एसआईटी को जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले हैं और जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
एसआईटी जांच पूरी होने के बाद दर्ज हो सकती है एफआईआर
मामले में अब तक तीन शिकायतें और तहरीरें दी जा चुकी हैं। हालांकि शिकायतकर्ताओं का मंदिर ट्रस्ट या मंदिर प्रबंधन से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। सूत्रों का कहना है कि संभवतः इसी कारण उनकी शिकायतों पर अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। यह भी चर्चा है कि अब मुकदमा एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट के आधार पर दर्ज किया जा सकता है।
जेवरातों के रिकॉर्ड पर भी उठे सवाल
एसआईटी की जांच में अब केवल नकदी ही नहीं बल्कि श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए सोने, चांदी और हीरे के जेवरातों का रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में आ गया है। सूत्रों के अनुसार ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारी दान में मिले जेवरातों का पूरा हिसाब-किताब और संबंधित रसीदें प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। इससे आशंका बढ़ गई है कि नकदी के साथ-साथ कीमती आभूषणों में भी गड़बड़ी हुई हो सकती है।
अनिल मिश्रा, चंपत राय और गोपाल राव से पूछताछ
चोरी का मामला सामने आने के कुछ दिनों बाद ट्रस्ट के पदाधिकारी अनिल मिश्रा केरल चले गए थे। स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर हुई इस यात्रा के बाद गुरुवार को उनके अयोध्या लौटने पर एसआईटी ने करीब तीन घंटे तक पूछताछ की। इसके अलावा ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और गोपाल राव से भी विस्तृत सवाल-जवाब किए गए। सूत्रों के मुताबिक जांच टीम को नकदी और जेवरातों के रिकॉर्ड में कई विसंगतियां मिली हैं।
टिन्नू यादव से दोबारा पूछताछ
चंपत राय के चालक टिन्नू यादव से एसआईटी ने दोबारा पूछताछ की। जांच का फोकस इस बात पर रहा कि दान राशि की गिनती और प्रबंधन में उसकी भूमिका क्या थी। सूत्रों के अनुसार पूछताछ के दौरान टिन्नू यादव ने अनिल मिश्रा और गोपाल राव का नाम भी लिया है। इसके बाद जांच एजेंसियों का ध्यान इन दोनों की भूमिका पर और अधिक केंद्रित हो गया है।
18 लोगों से हुई पूछताछ
एसआईटी ने चौथे दिन ट्रस्ट पदाधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य संदिग्धों समेत करीब 18 लोगों से पूछताछ की। इनमें टिन्नू यादव का भतीजा मनीष यादव और गोपाल राव का भतीजा सोमेश भी शामिल रहे। हालांकि दोनों किसी आधिकारिक पद पर नहीं हैं, लेकिन मंदिर की विभिन्न व्यवस्थाओं में उनकी सक्रिय भूमिका होने की बात सामने आई है।
श्रद्धालु ने उठाया हार का मुद्दा
कर्नाटक के एक श्रद्धालु ने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि उन्होंने मंदिर में एक कीमती हार दान किया था, लेकिन उन्हें उसकी कोई रसीद नहीं मिली। उनका कहना है कि आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि उस हार का क्या हुआ। इसी तरह कई अन्य श्रद्धालुओं द्वारा भी दान किए गए जेवरातों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। एसआईटी इन सभी शिकायतों और दावों की गंभीरता से जांच कर रही है।
जांच के घेरे में आ सकते हैं बड़े नाम
सूत्रों के मुताबिक एसआईटी को जांच के दौरान ऐसे कई तथ्य मिले हैं, जिनके आधार पर मंदिर प्रबंधन से जुड़े कुछ बड़े नाम भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। फिलहाल जांच जारी है और सभी की नजरें एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं।
यहां भी पढ़ें-
वाराणसी में शादी समारोह बना मातम: जयमाल के दौरान विवाद, बीच-बचाव करने पहुंचे पड़ोसी की मौत