तुर्की S-400 डील नए मोड़ पर है। F-35 लड़ाकू विमान की वापसी के लिए तुर्की रूस के S-400 सिस्टम को बेचने पर विचार कर रहा है। जानिए पूरी रिपोर्ट।

नई दिल्ली/अमर भारती। तुर्की S-400 डील एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय रक्षा और कूटनीति के केंद्र में है। रूस से खरीदी गई अत्याधुनिक S-400 एयर डिफेंस मिसाइल प्रणाली को लेकर तुर्की अब नई रणनीति पर काम करता दिखाई दे रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अंकारा इस सिस्टम को किसी तीसरे देश को बेचने की संभावनाएं तलाश रहा है ताकि अमेरिका के साथ वर्षों से चले आ रहे रक्षा विवाद का समाधान निकल सके और उसे दोबारा F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट कार्यक्रम में शामिल होने का रास्ता मिल सके। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया, यूक्रेन युद्ध और NATO की बदलती सुरक्षा रणनीतियों ने वैश्विक रक्षा साझेदारियों को नई दिशा दी है।
भारत में S-400 की प्रभावशीलता ने बटोरी थी चर्चा
भारत ने रूस से प्राप्त S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को अपनी बहुस्तरीय वायु रक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। हाल के वर्षों में इस प्रणाली की क्षमता और प्रभावशीलता को लेकर व्यापक चर्चा हुई। इसकी पहचान लंबी दूरी तक दुश्मन के विमान, ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाने और उन्हें रोकने वाली अत्याधुनिक रक्षा प्रणाली के रूप में की जाती है। हालांकि, भारत और तुर्की की सुरक्षा परिस्थितियां, रक्षा साझेदारियां और रणनीतिक आवश्यकताएं अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों देशों के निर्णयों की तुलना समान संदर्भ में नहीं की जा सकती।
2017 में रूस से हुआ था S-400 खरीद समझौता
तुर्की S-400 डील की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब तुर्की ने रूस के साथ लगभग 2.5 अरब डॉलर में S-400 प्रणाली खरीदने का समझौता किया। वर्ष 2019 में इसकी पहली खेप तुर्की पहुंची। उस समय राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन ने इसे तुर्की की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के लिए आवश्यक बताया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि देश अपनी सुरक्षा नीति तय करने के लिए स्वतंत्र है और बाहरी दबाव में निर्णय नहीं लेगा।
अमेरिका ने क्यों जताई थी आपत्ति?
तुर्की द्वारा S-400 खरीदने के बाद अमेरिका ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। वॉशिंगटन का तर्क था कि यदि रूसी S-400 प्रणाली और अमेरिकी F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट एक ही देश में संचालित होंगे तो संवेदनशील सैन्य तकनीक के लीक होने का खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका का मानना था कि S-400 के रडार और सेंसर F-35 की स्टेल्थ क्षमताओं से जुड़ी अहम जानकारियां एकत्र कर सकते हैं। इसी वजह से तुर्की को F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया और CAATSA (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) के तहत प्रतिबंध भी लगाए गए।
अब क्यों बदला तुर्की का रुख?
वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में तुर्की अमेरिका और NATO के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करना चाहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा चुनौतियां और आधुनिक लड़ाकू विमानों की आवश्यकता ने तुर्की को नई रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है। अंकारा लंबे समय से F-35 कार्यक्रम में वापसी की कोशिश कर रहा है, क्योंकि यह पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान उसकी वायुसेना की क्षमता को काफी मजबूत कर सकता है।
क्या S-400 को बेच सकता है तुर्की?
तुर्की के कई मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट के अनुसार सरकार S-400 प्रणाली को किसी खाड़ी देश को बेचने की संभावना पर विचार कर रही है। रिपोर्टों में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का नाम संभावित खरीदारों के रूप में सामने आया है। हालांकि अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक समझौता सार्वजनिक नहीं किया गया है। यदि ऐसा होता है तो यह तुर्की की रक्षा नीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा।
रूस ने क्या कहा?
रिपोर्टों के अनुसार, रूस ने इस मुद्दे पर तुर्की के साथ संपर्क में होने की पुष्टि की है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील विषय है और इस पर रूस तथा तुर्की के बीच लगातार बातचीत जारी है। हालांकि उन्होंने संभावित बिक्री या किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं की। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच अभी भी बातचीत का दौर जारी है।
F-35 की वापसी क्यों चाहता है तुर्की?
तुर्की के लिए F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट केवल एक आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं बल्कि NATO के साथ तकनीकी और सामरिक एकीकरण का भी प्रतीक है। यदि तुर्की दोबारा इस कार्यक्रम में शामिल होता है तो उसे आधुनिक स्टेल्थ तकनीक, नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता और अत्याधुनिक एवियोनिक्स तक पहुंच मिल सकती है। इसी वजह से अंकारा अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने में रुचि दिखा रहा है।
ट्रंप की रणनीति और अमेरिका फर्स्ट नीति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से “America First” नीति के समर्थक रहे हैं। वे कई मौकों पर सहयोगी देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने, अमेरिकी रक्षा उपकरण खरीदने और रणनीतिक फैसलों में अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने का दबाव बनाते रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, तुर्की के साथ भी अमेरिका की प्राथमिकता यही है कि वह रूस पर रक्षा निर्भरता कम करे और अमेरिकी रक्षा उद्योग के साथ दोबारा जुड़ जाए। हालांकि, अमेरिका या तुर्की की ओर से किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक घोषणा अभी तक नहीं की गई है।
NATO और क्षेत्रीय राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?
यदि तुर्की S-400 डील का नया स्वरूप सामने आता है और अंकारा वास्तव में इस प्रणाली से अलग होता है, तो इसका असर केवल अमेरिका और तुर्की तक सीमित नहीं रहेगा। इससे NATO की सामूहिक सुरक्षा रणनीति, रूस के रक्षा निर्यात और पश्चिम एशिया की शक्ति संतुलन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, खाड़ी क्षेत्र के किसी देश द्वारा S-400 खरीदने की स्थिति में वहां की रक्षा संरचना में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
तुर्की S-400 डील केवल एक रक्षा खरीद का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह रूस, अमेरिका, NATO और पश्चिम एशिया के बीच बदलते रणनीतिक समीकरणों का प्रतीक बन चुका है। एक ओर तुर्की आधुनिक अमेरिकी F-35 कार्यक्रम में वापसी चाहता है, वहीं दूसरी ओर उसे रूस के साथ रक्षा संबंधों का भी संतुलन बनाए रखना है। फिलहाल S-400 की संभावित बिक्री, अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत और F-35 कार्यक्रम में वापसी को लेकर कई चर्चाएं चल रही हैं, लेकिन अंतिम निर्णय संबंधित देशों की आधिकारिक घोषणाओं और भविष्य की कूटनीतिक वार्ताओं पर निर्भर करेगा।
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