जब मंच पर उतरे बुद्ध, लक्ष्मण और द्वारिकाधीश… लखनऊ में संस्कृति ने रचा यादगार उत्सव

लखनऊ, एक ही मंच पर भगवान बुद्ध की करुणा, लक्ष्मण के त्याग और श्रीकृष्ण के लोककल्याणकारी स्वरूप की झलक देखने को मिली। अवसर था अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, बदलाव–एक कदम शिक्षा की ओर और कला कारवां के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वीरांगना सम्मेलन एवं लक्ष्मणपुरी फेस्टिवल-2026 का। रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर आयोजित इस सांस्कृतिक महोत्सव में कला, साहित्य, लोक परंपरा और सामाजिक चेतना के रंग बिखरे।
गोमतीनगर स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के प्रेक्षागृह में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों के सम्मान से हुई। वरिष्ठ रंगकर्मी एवं अभिनेता डॉ. अनिल रस्तोगी, वरिष्ठ पत्रकार श्याम कुमार, उद्यमी यावर अली शाह और रोटरी क्लब के असिस्टेंट गवर्नर प्रवीण कुमार मित्तल को लक्ष्मणपुरी गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया। वहीं पद्मश्री विद्या विंदु सिंह, शिक्षाविद रोमा बच्चानी, शिक्षिका डॉ. अनीता मिश्रा और अभिनेत्री मनीषा मेहरा को रानी लक्ष्मीबाई प्रेरणा सम्मान प्रदान किया गया।
सम्मान समारोह के बाद मंच पर प्रस्तुत हुई नृत्य नाटिका ‘बुद्धम शरणम् गच्छामि’, जिसने दर्शकों को भगवान गौतम बुद्ध के जीवन दर्शन से रूबरू कराया। राजकुमार सिद्धार्थ के वैभवशाली जीवन से लेकर सत्य की खोज, बोधगया में ज्ञान प्राप्ति और बुद्ध बनने तक की यात्रा को भावपूर्ण नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। कथक गुरु डॉ. उपासना दीक्षित के निर्देशन में मंचित इस प्रस्तुति ने अहिंसा, करुणा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। कलाकारों की सशक्त अभिव्यक्ति और संगीत ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इसके बाद दास्तानगो अरशाना अजमत और प्रतीक भारद्वाज ने ‘लक्ष्मणगाथा’ के माध्यम से रामायण के अद्वितीय पात्र लक्ष्मण के त्याग, समर्पण और धर्मनिष्ठा को शब्दों में जीवंत किया। प्रस्तुति में उर्मिला के मौन त्याग और प्रेम को भी संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया, जिसने दर्शकों को भावुक कर दिया।
कार्यक्रम का सबसे भव्य आकर्षण रहा ‘कान्हा से द्वारिकाधीश’ नाटक। लगभग 50 कलाकारों की इस प्रस्तुति में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर द्वारका के आदर्श शासक बनने तक की यात्रा को प्रभावशाली ढंग से मंचित किया गया। गोकुल की माखन-चोरी, कालिया नाग मर्दन, गोवर्धन धारण, रासलीला, कंस वध और द्वारका स्थापना जैसे प्रसंगों ने दर्शकों को कृष्ण के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचित कराया। अमित दीक्षित राम जी के निर्देशन में मंचित इस नाटक ने प्रेम, नीति, धर्म और नेतृत्व का सुंदर संदेश दिया।
कार्यक्रम में उपस्थित कला प्रेमियों ने प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन न केवल सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखते हैं बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय परंपराओं और आदर्शों से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। वीरांगना सम्मेलन एवं लक्ष्मणपुरी फेस्टिवल-2026 ने एक बार फिर साबित किया कि लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविधता, संवेदनशीलता और समृद्ध परंपराओं में निहित है।